सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समान नागरिक संहिता क्या है और अभी तक किसी सरकार ने इसे लागू क्यों नहीं किया हैं? इसे लागू करने से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं?


"अपने-अपने धर्मों को अपने तक सीमित रखे, इसे राष्ट्र का कानून बनाने की कोशिश न करें क्योंकि जब आप ऐसा करते है तब आप अपने ही राष्ट्र की प्रगति में बाधा बनते हैं।" 

"आप जिस किसी भी धर्म के हैं अगर आपके पास मानवता नहीं हैं तो आप मान लीजिये कि आप धर्म को नहीं मानते बल्कि आप तो जो नहीं हैं वो बनकर धर्म का अनादर करते हैं।"


समान नागरिक संहिता एक धर्मनिरपेक्ष कानून हैं जो एकता को दर्शाता है। यानी एक ही कानून सभी धर्मों के नागरिकों पर लागू होता है। यह कानून सभी धर्मों से ऊपर हैं। साफ़ साफ़ तौर पर कहे तो इस संहिता का किसी भी धर्म, जाति, वर्ग से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।
इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड भी कहते हैं। यह भारतीय संविधान के भाग 4 वे के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत आता है। यानी इसे राज्य के नीति निर्देशकों के तहत रखा गया है। इस संहिता में शादी, तलाक, गोद लेना और जमीन जायदाद के बंटवारे में एक समान कानून लागू करता है।

वर्षों से सरकारें तो बदलती रही पर किसी ने भी इसे लागू नहीं किया। इस पर जमकर बहस भी हुआ पर समस्या जस का तस बना रहा। आखिर इसे लागू करने से पिछली सरकारें क्यों कतराती रही हैं और अब की भी। जानेगें आखिर इसकी क्या वजहें हैं जो हमेशा बहस का मुद्दा बनता तो हैं पर लागू नहीं होता?

उसे जानने से पहले जो अभी का कानून है उस बारे में आइए जानते हैं। हमारे देश में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इसी कारण हमारे राष्ट्र का निजी कानून अधिकतर इन्हीं धर्मों के रीति-रिवाजों पर आधारित है जो निजी कानून के नाम से जानी जाती हैं। इन्हीं निजी कानूनों से ही वर्तमान में किसी भी मामलों का निपटारा होता है। 

हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध ये धर्म हिन्दू विधि के अंतर्गत आते है। यह संसद द्वारा पारित किया गया हिन्दू कोड बिल है। जब कि मुस्लिम, ईसाई, पारसी के अपने निजी कानून धर्मों के आधार पर तय किए गए हैं। खासकर मुसलमान भाई-बहनों का निजी कानून शरीयत पर आधारित है।

जिसके कारण मुख्य रूप से ये चीज प्रभावित होती है


1
इन्हीं निजी कानूनों से हमारे न्यायपालिका पर बोझ पड़ता हैं। इस संहिता के लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी। अदालतों में वर्षों से पड़े लंबित मामलों की सुनवाई जल्द हो सकेंगी।

2
वर्षों से हमारे देश के नेताओं ने आज तक आपके धर्मों, जातियों, वर्गों को आधार बनाकर वोट मांगते आए है। इस संहिता के लागू होने के बाद वो आपसे आपके धर्मों, जातियों, वर्गों के नाम पर वोट नहीं मांग पाएंगे। इससे हमारे देश के भ्रष्ट्राचारी नेताओं का वोट बैंक का एक बड़ा सा स्त्रोत खत्म होगा। इससे हमारा देश तेजी से प्रगति करेगा।

3
महिलाओं की वर्तमान की स्थिति में सुधार होगा। कुछ पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित है। खासकर मुस्लिमों के निजी कानून जिसके तहत महिलाओं के साथ शोषण होता है वो खत्म हो जाएगा। इतना ही नहीं महिलाओं का अपने पति की संपत्ति पर अधिकार, गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून लागू होने से महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी और उनको वो सम्मान मिल सकेगा जिसकी वो हमेशा से हकदार रही हैं।

4
चौथा कि इन्हीं अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण देश के अलग-अलग धर्म के लोग आपस में भेदभाव करते हैं और इससे देश में बड़े स्तर पर असमानताएं बढ़ती हैं। पर्सनल लॉ भेदभाव का बहुत बड़ा स्रोत्र हैं। लोग एक-दूसरे के धर्मों, जातियों और वर्गों को आधार बनाकर लड़ते हैं। लोग मंदिर-मस्जिदों के नामों पर लड़ते हैं। अगर ऐसे में इस यूनिफार्म सिविल कोड को इम्पलीमेंट कर दिया जाता है तो भेदभाव का एक बहुत बड़ा स्रोत्र हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। जब सबके पास इक्वल राइट्स होंगे तो किसी के पास कोई आधार ही नहीं बचेगा कि वो किसी से भेदभाव कर पाए।

आज तक इस पर क्यों होता रहा है विरोध?
आपको इसको समझने के लिए आजादी के दिनों में चलना होगा जब 1947 में भारत की आजादी के बाद जब सभी धर्मों और जातियों के लिए अलग-अलग कानून बनाया जा रहा था उस वक्त भीमराव अम्बेडकर जी ने सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों के लिए एक समान कानून लागू पर जोर दिया पर कुछ अल्पसंख्य मुस्लिम यानी जो पार्टीशन के बाद इंडिया में ही रह गए थे उन्होंने सभी धर्मों पर एक समान कानून लागू करने के खिलाफ थे और आज भी वही मसला है जो वर्षों पहले था। इस संहिता का विरोध करने वालों का खासकर हमारे देश के मुसलमान भाई-बहनों का मानना है कि यह संहिता सभी धर्मों पर हिन्दू कानून को लागू करने जैसा है।

इस इकिस्ववी सदी में जहां हम एक कदम आगे बढ रहे हैं वहीं हम एक कदम पीछे जा रहे हैं। ऐसी प्रगति का क्या फायदा जिसमें आप एक कदम आगे जाए और उसी एक कदम से वापस आ जाए। मेरे मुताबिक ये कोई प्रगति नहीं हुआ। ये सिर्फ और सिर्फ हमें उसी रास्ते पर लाकर खड़ा कर देता है जहां कभी हम आजादी के दिनों में हुआ करते थे। जहां से हम कभी आए थे।
जब से हमारा देश आजाद हुआ है तब से ये निजी कानून एक अंधकार में धकेलता आया है और ये आज भी धकेल रहा है। जहां से हमारा कभी बाहर निकलना मुमकिन नहीं है। मान लीजिए कि आपके पास अभी दो रास्ते है, एक है अंधकार से भरा हुआ रास्ता और दूसरा प्रकाश से भरा हुआ है तो इन दोनों रास्तों में से आप किस रास्ते को चुनना पसंद करेंगे। आप सभी प्रकाश वाले रास्ते को ही चुनना पसंद करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि वही सही रास्ता हैं। आप कभी भी अंधकार वाले को चुनना नहीं पसंद करेंगे क्योंकि आप यह बात बहुत अच्छे से जानते हैं कि वहां गहरे अंधकार के सिवा और कुछ भी नहीं तो जाहिर सी बात है कि आप उस रास्ते को चुनना नहीं पसंद करेंगे। मैं आपको उसी समय से यही बात समझाने की कोशिश कर रही हूं। मेरे कहने का मतलब है कि जो अभी का निजी कानून है वो एक गहरे अंधकार से भरा रास्ता है और जिस सहिंता के बारे में बता रही हूं वो एक प्रकाशों से भरा रास्ता है। जहां पर सभी कानून आपको साफ़-साफ़ दिखाई देता है। 

गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहां ये कानून लागू हैं और इसके अलावा दुनिया के कई देशों में लागू है। यह संहिता पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान जैसे कई विकसित देशों में लागू हैं।

वर्षों से हमारे देश के मुसलमान भाई-बहन ये बात कहते आए है कि उनके साथ सरकारें असमानताओं वाले व्यवहार करती है और दूसरे धर्मों के लोग भी भेदभाव करते हैं और होता भी तो ऐसा हैं तो मैं आप सभी मुसलमानों से यह बात पूछना चाहती हूं कि जब ऐसा होता है तो आप इस सहिंता का समर्थन करने के बजाय आप खुलकर विरोध क्यों करते है? आपको तो इसका समर्थन करना चाहिए ताकि आपके साथ असमानताएं वाली जो भी व्यवहरें होती हैं वो न हो।

आप जिस किसी भी धर्म के हैं अगर आपके पास मानवता नहीं हैं तो आप मान लीजिये कि आप धर्म को नहीं मानते बल्कि आप तो जो नहीं हैं वो बनकर धर्म का अनादर करते हैं। अगर आप मानवता को ही अपना धर्म मानते तो शायद जो नेता वर्षों से आपसे जाति, धर्मों के नामों पर वोट मांग रहे थे उसे आप कभी नहीं देते। आपके इन्हीं धर्मों के श्रद्धा, विश्वास का फायदा अक्सर हमारे भ्रष्टाचार नेता उठाते हैं। जब कभी भी चुनाव आता हैं तो आपको धर्मों, जातियों, वर्गों के तरफ ध्यान भटा देते हैं और आप न समझ उसी में उलझ जाते हैं। आपको चुनाव के वक्त सिर्फ और सिर्फ अपने राष्ट्र की प्रगति के लिए खड़ा होना चाहिए न कि आपको अपने धर्मों के लिए।

अगर यह साहिंता लागू हो जाता है तो कोई भी नेता आपसे आपके धर्मों, जातियों और वर्गों के नाम वोटे नहीं मांगेगा। आप वोट उसी को देंगे जिससे आपकी राष्ट्र की प्रगति होगी।
अगर आप अपने राष्ट्र को प्रगतिशील बनते हुए देखना चाहते हैं तो आपको अपनी सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत हैं। अपने-अपने धर्मों को अपने तक सीमित रखे इसे राष्ट्र का कानून बनाने की कोशिश न करें क्योंकि जब आप ऐसा करते है तो आप अपने ही राष्ट्र की प्रगति में बाधा बनते हैं। आपको बता दूं कि आप अभी अपने ही राष्ट्र की बाधा बने हुए हैं क्योंकि आप हमेशा से इस संहिता का विरोध करते आए है तो जाहिर सी बात है आप बाधा है। धर्म तो सिर्फ एक जरिया है जिससे आप ईश्वर से जुड़कर उस मानवता को समझ पाते हैं जो हमें एक-दूसरे से जोड़े रखती हैं।


सरकार को चाहिए कि वो सभी धर्मों के ऊपर इस कानून को लागू करें और इसे किसी हिन्दू विधि के अंतर्गत न रखकर मानवता के अन्तर्गत रखकर कानून बनाए।
मेरे मुताबिक ये सहिंता किसी भी धर्म से सम्बन्धित नहीं होना चाहिए। इससे राष्ट्र की प्रगति होगी।

अगर आप भी मेरी तरह मानवता के धर्म में विश्वास रखते है तो ...

हमें उन भ्रष्टाचारी नेताओं को बताना होगा जो हमारे श्रद्धा, आस्था, विश्वास का फायदा अपने चुनावों के लिए करते हैं।

हमें उन्हें बताना होगा कि हम एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान करते हैं और इसे अपने तक सीमित रखते हैं।
हमें उन्हें बताना होगा कि हम मानवता,प्यार में विश्वास रखते हैं।


हमें उन्हें बताना होगा कि हम एक-दूसरे के आत्मिक सोचों सम्मान करके एक-दूसरे के दिलों से जुड़े रहते हैं और हम इस सहिंता का समर्थन करते हैं।

अगर आप चाहते हैं कि ये संहिता लागू हो तो आप एक सच्चे राष्ट्रवादी हैं। अगर आप नहीं चाहते तो आप एक अलगाववादी, विद्रोहवादी हैं जो ये कभी नहीं चाहता कि राष्ट्र मानवता के एक सूत्र में बंधे और प्रगति कर सकें।

क्या आप इस कानून के पक्ष में हैं? अगर हाँ तो #wesupportuniversalcivilcode 
आप हिंदी में भी #समान नागरिक संहिता लगाकर आप अपने समर्थन को जता सकते है।

मैं आपको एक बात बता दूं कि आप कोई भी हिंसात्मक बयानबाज़ी न करें क्योंकि इससे सरकारों पर बुरा असर पड़ता है। मै आपसे यह भी कहना चाहती हूं कि आप किसी भी तरह का हिंसात्मक विरोध न करे क्योंकि जब आप ऐसा करते है तो आप अपने ही राष्ट्र को नुकसान पहुंचाते है जब आपके राष्ट्र का नुकसान होगा तो नुकसान आपका भी होगा। मै आपको विरोध करने से मना नहीं कर रही बल्कि आपको समझा रही हूं।
आपको विरोध करना है तो आप विरोध कीजिए लेकिन हिंसात्मक नहीं अहिंसात्मक विरोध कीजिए क्योंकि इसे हमारे भारतीय संविधान आपको अधिकार देता है कि आप जिस कानून का समर्थन नहीं करते उसका खुलकर विरोध कर सकते है और जिस कानून का समर्थन करते है उसका खुलकर समर्थन कर सकते है क्योंकि ये गणराज्य है यहां का कोई राजा नहीं जो सिर्फ अपने कानून आप पर थोपे।
मै अपने विचार यही पर खत्म करना चाहूंगी। हम फिर मिलेंगे कभी किसी विशेष मुद्दे पर खुलकर अपने विचारों को साझा करूंगी तब तक के लिए आप अपना ख्याल रखिए।

धन्यवाद

दिवु सागा

 

 फॉलो करे 

Facebook    Twitter 


 

 


 











  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

“आपने विभिन्न धर्मों को बनाया हैं और अब आप इन्हीं धर्मों को लेकर आपस में लड़-झगड़ रहे है, वास्तव में यह मानवता का विनाश का पहला कदम हैं।”

  धर्मों को इन्सानों ने ही बनाया हैं। सदियों पहले भी धर्मों को लेकर एक जंग सी झिड़ गई थी। लोग ईश्वर को जानने के लिए अलग-अलग धर्मों को बनाना शुरू कर दिए। जिस धर्म को आपने बनाया हैं उसी के लिए आप आपस में लड़ रहे हैं। ईश्वर का कोई धर्म नहीं होता वो एक हैं। ईश्वर यह कभी नहीं चाहेंगे कि धर्मों के चलते उनके बच्चे में लड़े-झगड़े। धर्म शास्त्रों के द्वारा सिर्फ उन्हें समझा जा सकता है कि ईश्वर क्या है और कौन हैं और उनके वसूल क्या हैं जो उन्होने इन्सानों के लिए बनाए हैं। आजकल जिस इंसान के पास ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं हैं वही लोग ज़्यादातर धर्मों का पालन करने का दावा करते हैं पर वो वास्तव में ऐसा बिलकुल नहीं कर रहे होते हैं। अगर वो वास्तव में धर्म का पालन कर ईश्वर से जुड़े रहते तो वो कभी भी आपस में काट-मार न करते ,  वो कभी भी आपस में भेदभाव नहीं करते ,  वो कभी भी स्त्रियों के आत्मसम्मान को चोट न पहुंचाते आदि जैसे बहुत सारे गलत कार्य न करते। बड़े अफसोस के साथ मुझे यह कहना पड़ रहा हैं कि लोग आज कल  यही सब करते हैं। उन्हें एक समाज ,  एक राष्ट्र ,  एक दुनिया से कोई फर्क ...

संवादों की दुनिया

  एक नई शुरुआत करते हैं हम और आप संवादों की दुनिया आप सभी का बहुत स्वागत करती हूँ मैं और आशा करती हूँ की आप सब इस कोरोना महमारी में ठीक होंगे ये संवादों की दुनिया है जो राष्ट्र के लिए कार्य करती हैं भारत के विचारकों को यह मंच प्रदान करके अपने विचारों को देश के समक्ष रखने का अवसर देती हैं फिलहाल अभी इस संगठन की आधिकारिक रूप से किसी को भी सदस्यता नहीं दी गई हैं लेकिन अब हमारी संगठन ने इच्छुक लोगों को खासकर लेखकों को यह सदस्यता देने का फैसला किया हैं जहां पर उनके अलग-अलग विषयों पर विचार प्रस्तुत किए जाएंगे और समस्यों का समाधान भी अगर आपको लिखना सबसे अच्छा लगता है तो आप अपनी किसी भी विषय पर लिखी आर्टिक्ल नीचे दिये गए मेल पर भेज सकते हैं और अगर आप बोलकर अपनी बातों को बताने का शौक रखते है तो आप अपनी विडियो बनाकर भेज सकते हैं आपकी वो विडियो संवादों की दुनिया के यूट्यूब चैनल पर अपलोड की जाएंगी यह सदस्यता बिलकुल फ्री में दी जा रही हैं हमसे जुड़े रहिए और अपने विचारों को नया आयाम देते रहिए क्योंकि जिंदगी आगे बढ़ाने के साथ-साथ अपने विचारों को भी बढ़ाने का नाम हैं तो चलिये एक नई शुरुआत करते ...